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कांगड़ा में चिट्टा छोड़ने का इलाज: नशा मुक्ति केंद्र में कैसे होता है?

पहले दिन की जाँच से लेकर डिटॉक्स, रोज़ की दिनचर्या, काउंसलिंग और घर वापसी तक, पूरा इलाज आसान हिंदी में।

अपडेट: अक्टूबर 202610 मिनट पढ़ेंएशान टीम द्वारा रिसर्च

कांगड़ा में चिट्टा छोड़ने का इलाज नशा मुक्ति केंद्र की जानकारी
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छोटा जवाब

कांगड़ा में चिट्टा छोड़ने का इलाज: मरीज़ का पहले डॉक्टर और जनरल फ़िज़ीशियन से चेकअप और वाइटल्स की जाँच होती है। फिर मनोचिकित्सक की निगरानी में 15 दिन से एक महीने का मेडिकल डिटॉक्स चलता है। उसके बाद योग, मीटिंग, वर्क थेरेपी, खेल, रोज़ की काउंसलिंग, फैमिली काउंसलिंग और रिलैप्स प्रिवेंशन के ज़रिए इलाज आगे बढ़ता है।

कांगड़ा में जब किसी घर में पता चलता है कि बेटा या भाई चिट्टा ले रहा है, तो सबसे पहला सवाल यही होता है: इलाज होता कैसे है, और क्या वह सच में छोड़ पाएगा? इस लेख में हम उसी का जवाब दे रहे हैं, कदम दर कदम।

ईमानदार बात: यह गाइड एशान चैरिटेबल ट्रस्ट ने तैयार की है, इसलिए इसमें हमारे अपने इलाज का ज़िक्र भी है। जानकारी समय के साथ बदलती है, इसलिए दाख़िले से पहले हमसे फ़ोन पर पुष्टि कर लें। यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं लेता।

14.9 kg

हिमाचल में पकड़ी गई हेरोइन 2022 में, जबकि 2017 में 3.4 kg थी (The Tribune)

1,150

2020 के सर्वे में नशा मुक्ति केंद्रों के इतने लोग, जिनमें 15 से 30 साल की उम्र में चिट्टा ने चरस को पीछे छोड़ा (The Tribune)

1,300+

2024 से 2025 में हिमाचल में दर्ज NDPS मामले, कई चिट्टा से जुड़े (The Tribune)

6 से 12 घंटे

आख़िरी खुराक के बाद हेरोइन की तकलीफ़ शुरू होने का आम समय (WikEM)

चिट्टा क्या है और इसे छोड़ना इतना मुश्किल क्यों होता है

चिट्टा असल में मिलावटी हेरोइन है। हिमाचल में पकड़े गए सैंपल की फ़ोरेंसिक जाँच में पता चला कि इसमें हेरोइन के साथ दूसरी दवाइयाँ भी मिली होती हैं। Tribune की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब से आने वाला चिट्टा ज़्यादा ख़तरनाक पाया गया, और इससे प्लेटलेट्स बहुत नीचे तक गिर सकते हैं। नूरपुर इलाक़े पर Tribune की एक और रिपोर्ट बताती है कि जो लोग पहले चिट्टा फ़ॉइल पर रखकर सूँघते थे, वे अब इंजेक्शन से लेने लगे हैं, और ऐसे लोगों में HIV और हेपेटाइटिस C के मामले भी मिले हैं।

हेरोइन दिमाग़ के उस हिस्से पर असर करती है जो दर्द और ख़ुशी को संभालता है। कुछ महीने लेने के बाद शरीर को उसकी आदत पड़ जाती है। जिस दिन नशा नहीं मिलता, बदन टूटता है, नींद उड़ जाती है, उल्टी और दस्त होते हैं और मन में सिर्फ़ एक ही बात घूमती है: बस एक बार और। इसी तकलीफ़ से बचने के लिए आदमी दोबारा नशा उठा लेता है। यह कमज़ोरी नहीं है, यह एक बीमारी है, और इसका इलाज डॉक्टर की निगरानी में ही सही तरह से होता है।

अगर आपके घर में कोई चिट्टा ले रहा है और आप समझ नहीं पा रहे कि बात कैसे शुरू करें, तो पहले हमारा यह लेख पढ़ें: घर में कोई चिट्टा ले रहा है तो क्या करें। छोड़ने के आम तरीकों पर चिट्टा कैसे छोड़ें में अलग से बात की है।

कांगड़ा में चिट्टा छोड़ने का इलाज: पूरी प्रक्रिया एक नज़र में

नीचे वही क्रम है जिस तरह एशान चैरिटेबल ट्रस्ट में चिट्टा के मरीज़ का इलाज चलता है। हर क़दम का विस्तार आगे अलग हिस्सों में है।

  1. दाख़िला और पहली जाँच

    डॉक्टर और जनरल फ़िज़ीशियन मरीज़ को देखते हैं, वाइटल्स नापे जाते हैं, पूरी हिस्ट्री ली जाती है।

  2. मेडिकल डिटॉक्स

    मनोचिकित्सक की निगरानी में दवा और देखभाल के साथ शरीर से नशा निकाला जाता है। आम तौर पर यह 15 दिन से एक महीने तक चलता है।

  3. रिहैब की दिनचर्या शुरू

    योग, एक्सरसाइज़, मॉर्निंग मीटिंग, JFT, ग्रुप सेशन, वर्क थेरेपी, खेल और पौष्टिक खाना।

  4. काउंसलिंग

    रोज़ की वन टू वन काउंसलिंग, ग्रुप काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक के साथ काम।

  5. फैमिली काउंसलिंग

    परिवार को भी समझाया जाता है कि मरीज़ को घर लौटने पर कैसे संभालना है।

  6. रिलैप्स प्रिवेंशन और आफ्टरकेयर

    घर लौटने की योजना, फ़ॉलो अप कॉल और विज़िट।

पहला दिन: दाख़िला, डॉक्टर और जाँच

हम दाख़िले को डराने वाली चीज़ नहीं बनाते। परिवार फ़ोन या WhatsApp पर बात करता है, हम मरीज़ की हालत समझते हैं और आम तौर पर एक या दो दिन के भीतर दाख़िला हो जाता है। पूरा रिहैब प्रोग्राम ज़्यादा से ज़्यादा 180 दिन तक चल सकता है।

हमारी एक सख़्त नीति है: मारपीट नहीं, ज़ंजीर नहीं, कमरे में ताला नहीं और ज़बरदस्ती उठाकर लाना नहीं। मरीज़ को समझा कर, परिवार के साथ बात करके लाया जाता है।

दाख़िले के दिन क्या-क्या होता है

  • डॉक्टर और जनरल फ़िज़ीशियन की जाँच: पहले यह देखा जाता है कि मरीज़ की शारीरिक हालत कैसी है।
  • वाइटल्स: ब्लड प्रेशर, नब्ज़, तापमान, ऑक्सीजन और वज़न नापे जाते हैं।
  • पूरी हिस्ट्री: कब से, कितना और कैसे चिट्टा लिया जा रहा है, पहले कोई बीमारी या दवा तो नहीं चल रही, पहले कभी इलाज हुआ या नहीं।
  • ज़रूरत के हिसाब से जाँच: डॉक्टर जो टेस्ट ज़रूरी समझें, वे करवाते हैं। इंजेक्शन से नशा करने वालों में HIV और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमण मिलते हैं (Tribune, नूरपुर), इसलिए इनकी जाँच और ज़रूरत पड़ने पर इलाज भी ज़रूरी है।
  • मनोचिकित्सक का आकलन: नशे के साथ नींद, घबराहट या उदासी जैसी दिक़्क़तें हैं या नहीं, यह भी देखा जाता है।
  • परिवार से बातचीत: कौन संपर्क में रहेगा, कब बात होगी, इलाज की रूपरेखा क्या है, सब साफ़ बताया जाता है।

कमरे में बसाने के बाद मरीज़ को आराम करने दिया जाता है। पहले दिन सबसे ज़रूरी चीज़ है कि मरीज़ को लगे कि वह सुरक्षित जगह पर है, जेल में नहीं।

डिटॉक्स: दवा, निगरानी और 15 दिन से एक महीने का समय

चिट्टा छोड़ने का पहला हिस्सा है मेडिकल डिटॉक्स, यानी शरीर से नशा निकालना। हेरोइन के मामले में मेडिकल जानकारी के अनुसार तकलीफ़ आख़िरी खुराक के लगभग 6 से 12 घंटे बाद शुरू होती है, 24 से 72 घंटे के बीच सबसे तेज़ होती है और ज़्यादातर लोगों में 7 से 10 दिन में काफ़ी कम हो जाती है (WikEM)। WHO की गाइडलाइन के अनुसार यह निकासी बहुत कष्टदायक होती है पर आम तौर पर जानलेवा नहीं होती, और दवा से इसे सहने लायक़ और कामयाब बनाया जा सकता है।

उसी गाइडलाइन में यह भी साफ़ लिखा है कि सिर्फ़ डिटॉक्स अपने आप में इलाज नहीं है, क्योंकि दोबारा नशे की तरफ़ लौटने की दर ऊँची है। इसलिए डिटॉक्स के साथ काउंसलिंग और मनोसामाजिक मदद ज़रूर दी जानी चाहिए। हमारे प्रोग्राम का ढाँचा यही है (WHO गाइडलाइन)।

फिर हम 15 दिन से एक महीने तक क्यों रखते हैं? क्योंकि पहले हफ़्ते के बाद भी नींद, भूख, चिड़चिड़ापन और बदन का दर्द पूरी तरह ठीक नहीं होते। इस पूरे दौर में डॉक्टर मरीज़ को देखते रहते हैं और ज़रूरत के हिसाब से इलाज बदलते हैं। हर मरीज़ अलग होता है, इसलिए दिन कम या ज़्यादा हो सकते हैं।

डिटॉक्स में क्या होता है

  • मनोचिकित्सक रोज़ मरीज़ की हालत देखते हैं और दवा तय करते हैं।
  • दवा सिर्फ़ डॉक्टर की पर्ची और निगरानी में दी जाती है। उल्टी, दस्त, दर्द, बेचैनी और नींद जैसी तकलीफ़ों के लिए अलग से इलाज होता है।
  • WHO की गाइडलाइन में निकासी के लिए बुप्रेनॉर्फ़िन और मेथाडोन जैसी दवाएँ और क्लोनिडीन जैसी दवाएँ बताई गई हैं, और दोबारा नशे से बचाव के लिए नाल्ट्रेक्सोन। कौन सी दवा, कितनी और कब, यह फ़ैसला पूरी तरह इलाज करने वाले मनोचिकित्सक का होता है।
  • पानी, नमक और खाने का ध्यान रखा जाता है ताकि कमज़ोरी और डिहाइड्रेशन न हो।
  • नर्सिंग स्टाफ़ और काउंसलर पास रहते हैं, ताकि मरीज़ अकेला न पड़े।
ज़रूरी बात: घर पर ख़ुद से या किसी के बताए नुस्ख़े से दवा लेकर चिट्टा न छुड़ाएँ। चिट्टा में मिलावट होती है और नशा कुछ दिन छूटने पर शरीर की सहनशक्ति गिर जाती है। ऐसे में दोबारा पुरानी मात्रा लेने से जान जा सकती है। इसलिए डिटॉक्स डॉक्टर की निगरानी में ही कराएँ।

डिटॉक्स के बाद: रिहैब की रोज़ की दिनचर्या

नशा शरीर से निकलना इलाज का आधा हिस्सा है। बाक़ी आधा इस पर निर्भर करता है कि मरीज़ का दिन कैसे बीतता है। ख़ाली दिमाग़ और ख़ाली समय नशे की तरफ़ ले जाता है, इसलिए हम दिन को ढाँचा देते हैं। रिहैब में मोटे तौर पर यह सब चलता है:

सुबह का योग और मेडिटेशन

सुबह 6 बजे योग से दिन शुरू होता है। शरीर हल्का होता है और मन शांत रहता है। तनाव और घबराहट के लिए योग पर हमारा अलग लेख भी है।

मॉर्निंग मीटिंग और JFT

दिन की शुरुआत ग्रुप मीटिंग से होती है। JFT यानी Just For Today की सोच पढ़ी जाती है: बस आज का दिन नशे के बिना।

एक्सरसाइज़ और खेल

कसरत और खेल से नींद सुधरती है, ऊर्जा लौटती है और मन में अच्छा महसूस करने के सेहतमंद तरीक़े बनते हैं।

वर्क थेरेपी

रोज़ के काम में हिस्सा लेने से ज़िम्मेदारी की आदत लौटती है और ख़ाली बैठने का समय कम होता है।

पौष्टिक खाना

घर जैसा खाना, समय पर। नशे में रहने वाले शरीर में कमज़ोरी बहुत होती है, उसे ठीक होने के लिए सही खाने की ज़रूरत है।

ग्रुप सेशन

दूसरे लोग भी इसी रास्ते से गुज़र रहे होते हैं। यहाँ मरीज़ को पहली बार लगता है कि वह अकेला नहीं है।

इसी दिनचर्या में मरीज़ की रोज़ की वन टू वन काउंसलिंग भी चलती है। रिहैब में एक आम दिन कैसा होता है, इस पर रिहैब सेंटर में क्या होता है पढ़ सकते हैं।

काउंसलिंग: मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक और दवा का साथ

चिट्टा छुड़ाने में दवा सिर्फ़ तकलीफ़ कम करती है। नशे की जड़ तक काउंसलिंग पहुँचती है। मरीज़ को समझना होता है कि वह नशे की तरफ़ क्यों गया: दोस्तों का दबाव, बेरोज़गारी, तनाव, घर की परेशानी या सिर्फ़ जिज्ञासा। Tribune की रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों ने भी बेरोज़गारी, साथियों का दबाव और जिज्ञासा को बड़ी वजह बताया है।

WHO की गाइडलाइन के अनुसार दवा के साथ सोच और व्यवहार पर आधारित मनोसामाजिक थेरेपी जुड़ने से इलाज ज़्यादा असरदार होता है।

तीनों का काम अलग है

  • मनोचिकित्सक: दवा तय करते हैं, नींद, घबराहट और उदासी जैसी दिक़्क़तों को देखते हैं, इलाज की दिशा तय करते हैं।
  • काउंसलर और मनोवैज्ञानिक: रोज़ की वन टू वन बातचीत और ग्रुप काउंसलिंग में सोच और आदतें बदलने पर काम करते हैं।
  • नर्सिंग और देखभाल स्टाफ़: दवा समय पर देना, हालत पर नज़र रखना, और मरीज़ का हौसला बनाए रखना।

इन सबके तालमेल को ही असली इलाज कहा जा सकता है। मनोविज्ञान की इस बात को आसान भाषा में नशे का मनोविज्ञान लेख में समझाया है। हमारी पूरी सेवाओं की सूची नशा मुक्ति इलाज पेज पर है।

परिवार की भूमिका और फैमिली काउंसलिंग

नशा सिर्फ़ एक आदमी को नहीं, पूरे घर को बीमार करता है। माँ-बाप रात भर जागते हैं, पत्नी डर में जीती है, भाई-बहन चुप हो जाते हैं। इसलिए हम फैमिली काउंसलिंग को इलाज का ज़रूरी हिस्सा मानते हैं।

  • परिवार को चिट्टा, उसकी लत और रिलैप्स के बारे में सही जानकारी दी जाती है।
  • घर लौटने पर कैसे बात करें, कैसे भरोसा दोबारा बने, पैसे और आज़ादी कैसे संभालें, यह सिखाया जाता है।
  • ग़ुस्सा, शर्म और डर जैसी भावनाओं पर खुलकर बात की जाती है। परिवार को ख़ुद भी सहारे की ज़रूरत होती है।
  • हमारे एक पूर्व निवासी कमल ने भी लिखा कि उनका परिवार काउंसलिंग का हिस्सा बना, और इससे फ़र्क़ पड़ा।

रिलैप्स प्रिवेंशन और आफ्टरकेयर

रिहैब से निकलना मंज़िल नहीं है। असली परीक्षा घर लौटने के बाद शुरू होती है, जब पुराने दोस्त, पुरानी जगहें और पुराना तनाव फिर सामने आते हैं। इसलिए हम रिहैब के दौरान ही रिलैप्स प्रिवेंशन प्लान बनवाते हैं।

  • मरीज़ पहचानता है कि कौन सी जगह, कौन से लोग और कौन सी भावनाएँ उसे नशे की तरफ़ खींचती हैं (ट्रिगर)।
  • हर ट्रिगर के लिए पहले से तैयार जवाब बनता है: किसे फ़ोन करना है, कहाँ जाना है, क्या नहीं करना है।
  • घर लौटने के बाद नियमित दिनचर्या, काम या पढ़ाई की योजना बनती है।
  • आफ्टरकेयर में हमारी टीम फ़ॉलो अप कॉल और विज़िट के ज़रिए संपर्क में रहती है।

अगर कभी फिसलन हो भी जाए तो उसे हार न मानें। तुरंत टीम को बताएँ ताकि बात बिगड़ने से पहले संभल जाए।

एशान चैरिटेबल ट्रस्ट में चिट्टा का इलाज कैसा है

हमारे संस्थापक ने बार-बार देखा कि हिमाचल के परिवार रिहैब के लिए ज़मीन बेच रहे हैं या क़र्ज़ ले रहे हैं, या अपने बेटों को ऐसे सेंटरों में भेज रहे हैं जहाँ डॉक्टर नहीं है, लोगों को बंद रखा जाता है और पीटा जाता है। इसी से एक चैरिटेबल ट्रस्ट बना, एक नियम के साथ: मनोचिकित्सक की देखरेख में सही इलाज, उस फ़ीस पर जो आम हिमाचली परिवार दे सके। सस्ता इलाज नहीं, असली इलाज, जो सबकी पहुँच में हो।

एशान चैरिटेबल ट्रस्ट एक रजिस्टर्ड चैरिटेबल ट्रस्ट है, सरकारी केंद्र नहीं। यह कांगड़ा के टांडा कोली में डॉ. आर.पी.जी.एम.सी. टांडा के पास है। यहाँ चिट्टा के मरीज़ का इलाज ऊपर बताए पूरे क्रम से होता है।

पूर्णकालिक मनोचिकित्सक

मेडिकल डिटॉक्स से लेकर पूरे इलाज तक डॉक्टर की निगरानी।

बिना मारपीट, बिना ताले

ज़ंजीर नहीं, बंद कमरा नहीं, ज़बरदस्ती उठा लाना नहीं।

परिवार के साथ काम

फैमिली काउंसलिंग और घर लौटने की योजना।

आफ्टरकेयर

फ़ॉलो अप कॉल और विज़िट, रिहैब के बाद भी साथ।

तीन प्लान, एक जैसा इलाज

तीनों प्लान में मनोचिकित्सक-नेतृत्व वाला इलाज एक जैसा है। फ़र्क़ सिर्फ़ कमरे और वन टू वन समय का है। जो परिवार ₹12,500 भी नहीं जुटा पा रहा, वह भी फ़ोन करे: जहाँ संभव हो, ट्रस्ट फ़ीस में रियायत करता है। पूरी जानकारी हिमाचल में रिहैब फ़ीस लेख में है।

Essential Care

₹12,500

प्रति माह

शेयर्ड कमरा

Comfort Care

₹25,000

प्रति माह

कम लोगों वाला कमरा, ज़्यादा वन टू वन समय

Premium Care

₹40,000

प्रति माह

प्राइवेट कमरा

पूर्व निवासी क्या कहते हैं

Ayush, Eshan Charitable Trust के पूर्व निवासी

★★★★★

Best decision I took. Staff treated me like family, and the morning yoga and group sessions really helped me stay on track. Thank you Eshan team.

Ayush, Former resident

Farhan, Eshan Charitable Trust के पूर्व निवासी

★★★★★

Proper doctor for detox and very good counsellors. Nobody treats you like a criminal here. Highly recommend.

Farhan, Former resident

Dinkar, Eshan Charitable Trust के पूर्व निवासी

★★★★★

I was scared rehab would be like a jail. It's nothing like that. Peaceful place, respectful staff. Got my life back.

Dinkar, Former resident

Kamal, Eshan Charitable Trust के पूर्व निवासी

★★★★★

Clean rooms, ghar jaisa khana and mountains all around. My family was part of the counselling too. Thank you Eshan 🙏

Kamal, Former resident

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हेल्पलाइन 24x7 चालू है। पहली बातचीत में कोई शुल्क नहीं।

कॉल करें: 062304 15581 WhatsApp करें

सही नशा मुक्ति केंद्र कैसे चुनें

कांगड़ा और आसपास कई सेंटर हैं। फ़ैसला लेने से पहले ये बातें ख़ुद जाकर या फ़ोन पर पूछें:

  • क्या मनोचिकित्सक पूर्णकालिक है, या सिर्फ़ नाम के लिए?
  • क्या डिटॉक्स डॉक्टर की निगरानी में होता है?
  • क्या मरीज़ को बाँधा, पीटा या कमरे में बंद तो नहीं किया जाता?
  • फ़ीस साफ़ बताई जाती है या बाद में अलग से माँगी जाती है?
  • क्या परिवार को काउंसलिंग में शामिल किया जाता है?
  • क्या आफ्टरकेयर मिलता है?

सरकारी इलाज भी एक विकल्प है

Tribune की रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों के लिए चार सरकारी नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र चल रहे हैं: कुल्लू, ऊना, हमीरपुर और कांगड़ा में (Tribune)। जून 2026 की ETV Bharat रिपोर्ट में टांडा मेडिकल कॉलेज में नया सरकारी केंद्र खोलने की तैयारी बताई गई थी, उसकी ताज़ा स्थिति अस्पताल से पूछ लें। नूरपुर सिविल अस्पताल में OST केंद्र भी चल रहा है (Tribune)। सरकारी हो या निजी, चुनने से पहले ऊपर के सवाल पूछें।

अगर जवाब टालमटोल वाले हों, तो सावधान हो जाएँ। सस्ते विकल्पों की तुलना के लिए हिमाचल के किफ़ायती नशा मुक्ति केंद्र पढ़ सकते हैं।

किन इलाक़ों से लोग आते हैं

एशान में कांगड़ा के साथ पूरे हिमाचल से मरीज़ आते हैं। अपने इलाक़े का पेज देखें: नशा मुक्ति केंद्र कांगड़ा, रिहैब सेंटर पालमपुर, रिहैब सेंटर धर्मशाला, रिहैब सेंटर नूरपुर, नशा मुक्ति केंद्र चंबा, रिहैब सेंटर बैजनाथ, रिहैब सेंटर मंडी, रिहैब सेंटर ऊना, रिहैब सेंटर हमीरपुर, रिहैब सेंटर बिलासपुर। किसी भी इलाक़े से सीधे संपर्क पेज से भी बात कर सकते हैं।

पता और नक्शा

एशान चैरिटेबल ट्रस्ट, FCI गोदाम के पास, टांडा कोली, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश 176001। फ़ोन: 062304 15581।

नक्शे में रास्ता देखें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कांगड़ा में चिट्टा छोड़ने का इलाज कैसे होता है?

पहले दिन डॉक्टर और जनरल फ़िज़ीशियन जाँच करते हैं और वाइटल्स नापते हैं। फिर मनोचिकित्सक की निगरानी में 15 दिन से एक महीने का मेडिकल डिटॉक्स होता है। इसके बाद योग, एक्सरसाइज़, मीटिंग, JFT, ग्रुप सेशन, वर्क थेरेपी, खेल, रोज़ की काउंसलिंग, फैमिली काउंसलिंग, रिलैप्स प्रिवेंशन और आफ्टरकेयर चलते हैं।

चिट्टा छोड़ने में कितना समय लगता है?

तकलीफ़ आम तौर पर कुछ घंटों में शुरू होकर पहले 3 दिन में सबसे तेज़ होती है और लगभग एक हफ़्ते से 10 दिन में कम होती है। फिर भी नींद और भूख ठीक होने में समय लगता है, इसलिए हमारे यहाँ डिटॉक्स आम तौर पर 15 दिन से एक महीने तक चलता है। पूरा रिहैब प्रोग्राम 180 दिन तक हो सकता है। हर मरीज़ अलग होता है।

चिट्टा छोड़ते समय क्या तकलीफ़ होती है?

बेचैनी, बदन और टाँगों में दर्द, उल्टी, दस्त, पसीना, ठंड लगना, जम्हाई और नींद न आना आम हैं। साथ में नशे की तेज़ तलब होती है। यह बहुत तकलीफ़देह लगता है, इसीलिए डॉक्टर की निगरानी में इलाज कराना बेहतर है।

क्या घर पर चिट्टा छोड़ना सुरक्षित है?

हम इसकी सलाह नहीं देते। WHO की गाइडलाइन के अनुसार हेरोइन की निकासी आम तौर पर जानलेवा नहीं होती, पर बहुत कष्टदायक होती है और दवा के बिना टिके रहना मुश्किल होता है। असली ख़तरे दूसरे हैं: चिट्टा में मिलावट, इंजेक्शन से होने वाले संक्रमण, और तलब के दबाव में दोबारा नशा करने पर पुरानी मात्रा से ओवरडोज़। डॉक्टर की निगरानी में डिटॉक्स कहीं ज़्यादा सुरक्षित है।

डिटॉक्स में कौन सी दवा दी जाती है?

दवा मरीज़ की हालत देखकर मनोचिकित्सक तय करते हैं। इसमें उल्टी, दस्त, दर्द, नींद और बेचैनी के लिए दवाएँ हो सकती हैं और ज़रूरत हो तो नियंत्रित दवा से इलाज भी। कृपया अपने आप कोई दवा न लें और न किसी को दें।

मरीज़ इलाज के लिए नहीं मान रहा, तो क्या करें?

ग़ुस्से या धमकी की जगह शांत बातचीत करें और उसे बताएँ कि इलाज बीमारी का है, सज़ा नहीं। हमारा लेख घर में कोई चिट्टा ले रहा है इसमें मदद करेगा। आप हमें फ़ोन करके भी सलाह ले सकते हैं।

क्या एशान में मरीज़ को बाँधा या मारा जाता है?

नहीं। हमारी सख़्त नीति है: मारपीट नहीं, ज़ंजीर नहीं, बंद कमरा नहीं और ज़बरदस्ती उठा लाना नहीं।

कांगड़ा में चिट्टा छुड़ाने का ख़र्च कितना है?

एशान में तीन प्लान हैं: Essential Care ₹12,500, Comfort Care ₹25,000 और Premium Care ₹40,000 प्रति माह। तीनों में इलाज एक जैसा है, फ़र्क़ कमरे और वन टू वन समय का है। ज़्यादा जानकारी के लिए हमारा फ़ीस वाला लेख देखें।

फैमिली काउंसलिंग में क्या होता है?

परिवार को लत और रिलैप्स की सही जानकारी दी जाती है, घर लौटने पर बातचीत और भरोसा बनाने के तरीक़े सिखाए जाते हैं, और परिवार की भावनाओं पर भी काम होता है।

क्या रिहैब के बाद दोबारा चिट्टा लेने का ख़तरा रहता है?

ख़तरा रहता है, इसलिए रिलैप्स प्रिवेंशन प्लान और आफ्टरकेयर इलाज का हिस्सा हैं। ट्रिगर पहचानना, सहारे के लोगों से जुड़े रहना और नियमित फ़ॉलो अप सबसे ज़्यादा काम आते हैं।

क्या स्वेच्छा से इलाज कराने पर कोई कानूनी राहत मिलती है?

NDPS एक्ट की धारा 64A (मूल पाठ) के अनुसार जो व्यक्ति ख़ुद आगे आकर किसी सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा चलाई या मान्य संस्था में पूरा इलाज कराता है, उसे धारा 27 और कम मात्रा के मामलों में मुक़दमे से छूट मिल सकती है। इलाज पूरा न करने पर यह छूट वापस ली जा सकती है। एशान एक निजी चैरिटेबल ट्रस्ट है, सरकारी केंद्र नहीं, इसलिए आपके केस में यह लागू होगी या नहीं, यह किसी वकील से ज़रूर पूछें।

दाख़िला कैसे होता है और कितना समय लगता है?

आप 062304 15581 पर कॉल या WhatsApp करें। हम हालत समझकर सलाह देते हैं और आम तौर पर एक या दो दिन में दाख़िला हो जाता है।

सरकारी हेल्पलाइन नंबर कौन से हैं?

नशा मुक्त भारत हेल्पलाइन 14446 और Tele-MANAS 14416 है। एशान की अपनी हेल्पलाइन 062304 15581 24x7 चालू है। हमारे बारे में और सवालों के जवाब FAQ पेज पर हैं।

स्रोत

  1. 'Chitta' reaching Himachal via Punjab more lethal, The Tribune
  2. State launches statewide drive to tackle rising 'chitta' menace, The Tribune
  3. Opioid withdrawal, WikEM
  4. Himachal CM launches anti-chitta campaign, PTI via The Week
  5. How Punjab's chitta took over Himachal Pradesh, Outlook India
  6. Guidelines for the psychosocially assisted pharmacological treatment of opioid dependence, WHO (2009)
  7. Section 64A, NDPS Act 1985 (text)
  8. Lack of drug de-addiction centres hinders Saarthi scheme in Nurpur, The Tribune
  9. Himachal's uphill war against drugs, The Tribune
  10. हिमाचल का पहला महिला नशा मुक्ति केंद्र, ETV Bharat (8 जून 2026)

यह जानकारी एशान टीम की रिसर्च पर आधारित है और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं से ली गई है।

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