घर का कोई अपना नशे में डूब चुका है और आप नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराने की सोच रहे हैं, तो एक मिनट रुकिए। सही केंद्र चुनना उतना ही ज़रूरी है जितना इलाज शुरू करना। जल्दबाज़ी में गलत जगह भर्ती करा देने से नुकसान भी होता है, और बेटे का भरोसा भी टूट जाता है।
ये गाइड उन परिवारों के लिए है जो कांगड़ा, पालमपुर, धर्मशाला, बैजनाथ, नूरपुर या शाहपुर में बैठकर रात को फोन पर केंद्र ढूंढ रहे हैं। हमने वो 10 चीज़ें एक जगह रख दी हैं जो भर्ती से पहले देख लेनी चाहिए। हर बात के साथ ये भी लिखा है कि उसे जांचना कैसे है, और कानून में उस पर क्या लिखा है।
ये जानकारी ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट की टीम ने तैयार की है, जो कांगड़ा में एक रजिस्टर्ड नशा मुक्ति केंद्र चलाती है, और इसे एक मनोचिकित्सक ने मेडिकली रिव्यू किया है। अगर आप अभी ये समझने की कोशिश में हैं कि घर में नशा हो रहा है या नहीं, तो पहले हमारी गाइड घर में कोई चिट्टा ले रहा है पढ़ लीजिए।
- रजिस्ट्रेशन देखे बिना भर्ती मत कराइए। हिमाचल में हर नशा मुक्ति केंद्र का राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण में रजिस्टर्ड होना कानून से ज़रूरी है।
- ज़ंजीर और अकेले कमरे में बंद करना कानून में मना है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 95 और धारा 97 देखिए।
- डिटॉक्स डॉक्टर की निगरानी में हो। अचानक नशा छुड़ाना दर्दनाक होता है, और शराब या नींद की गोलियों के साथ खतरनाक भी।
- फीस लिखित में लीजिए और हर भुगतान की रसीद लीजिए।
- जाकर खुद देखिए। कमरे, शौचालय और रसोई देखे बिना पैसे मत दीजिए।
- मुफ्त मदद भी मौजूद है। नशा मुक्ति हेल्पलाइन 14446 और टेली मानस 14416 पर बात कीजिए।
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती से पहले: 10 चीज़ें एक नज़र में
पूरी गाइड पढ़ने का वक्त नहीं है तो ये टेबल फोन में सेव कर लीजिए। हर चीज़ के आगे ये भी लिखा है कि उसे जांचें कैसे। नीचे हर बिंदु को विस्तार से समझाया गया है।
| नं. | क्या देखना है | कैसे जांचें |
|---|---|---|
| 1 | रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट | सर्टिफिकेट हाथ में लेकर नंबर और तारीख देखें, फिर प्राधिकरण की वेबसाइट या ज़िला सीएमओ दफ्तर से पुष्टि करें |
| 2 | डॉक्टर और मनोचिकित्सक | नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर पूछें, और ये भी कि वो हफ्ते में कितनी बार आते हैं |
| 3 | डिटॉक्स का तरीका | पूछें कि दवाइयों से तकलीफ कम की जाएगी या सिर्फ कमरे में बंद रखा जाएगा |
| 4 | स्टाफ और योग्यता | मनोवैज्ञानिक, काउंसलर, नर्स और फार्मासिस्ट से खुद मिलें, रात की ड्यूटी पूछें |
| 5 | भर्ती का कानूनी तरीका | सहमति से भर्ती है या सपोर्टेड भर्ती, ये लिखित में पूछें। उठाकर लाने वाली सेवा से बचें |
| 6 | मरीज़ के कानूनी हक | ज़ंजीर, एकांत कमरा, सिर मुंडवाना और बिना मेहनताने काम, सब मना है। नियम पूछें |
| 7 | फीस का पूरा ब्यौरा | लिखित फीस लें, डिटॉक्स और दवाइयां शामिल हैं या नहीं पूछें, रसीद लें |
| 8 | कमरा, सफाई और खाना | खुद जाकर कमरे, शौचालय, रसोई और खुली जगह देखें |
| 9 | मिलने और फोन के नियम | मुलाकात और फोन का तय समय पूछें, फैमिली काउंसलिंग होती है या नहीं |
| 10 | प्रोग्राम और आफ्टरकेयर | लिखित इलाज योजना, प्रोग्राम की लंबाई और डिस्चार्ज के बाद फॉलोअप पूछें |
एक बात साफ कर दें: ये गाइड किसी एक नशा मुक्ति केंद्र को चुनने के लिए नहीं लिखी गई। ये वो सवाल हैं जो आपको हमसे भी पूछने चाहिए। कोई भी ईमानदार केंद्र इन सवालों से नाराज़ नहीं होगा।
हिमाचल में नशा मुक्ति केंद्र चुनना इतना अहम क्यों है: आंकड़े
ये आंकड़े डराने के लिए नहीं हैं। ये बताने के लिए हैं कि देर करना और बिना जांचे भर्ती कराना, दोनों महंगे पड़ते हैं।
हिमाचल में 2023 से 2025 के बीच नशे की ओवरडोज़ से हुई मौतें: 2023 में 8, 2024 में 31 और 2025 में 27। स्रोत: ईटीवी भारत, 15 अप्रैल 2026
से ज़्यादा 30 साल तक के वो युवा, जो नशा मुक्ति केंद्रों के सर्वे में चिट्टे के आदी पाए गए। सर्वे में करीब 1,170 सैंपल लिए गए थे। स्रोत: ईटीवी भारत
नशीली दवाओं पर निर्भर लोगों में से सिर्फ इतनों को कभी भर्ती रहकर इलाज मिल पाया। स्रोत: एम्स की राष्ट्रीय रिपोर्ट, 2019
हिमाचल में मार्च 2020 से सितंबर 2021 के बीच बंद हुए निजी नशा मुक्ति केंद्र, कहीं मरीज़ की मौत, कहीं मानक पूरे न होने की वजह से। स्रोत: द ट्रिब्यून
कांगड़ा की अपनी रिपोर्ट क्या कहती है
द ट्रिब्यून ने 23 मार्च 2025 को कांगड़ा ज़िले पर एक जांच रिपोर्ट छापी थी। उसमें लिखा था कि ज़िले में सरकारी पुनर्वास केंद्र की कमी है, निजी नशा मुक्ति केंद्र तेज़ी से बढ़ रहे हैं, और कई नशा मुक्ति केंद्रों के पास नशा उपचार केंद्र का लाइसेंस तक नहीं है। रिपोर्ट में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर की कमी, छह महीने या उससे ज़्यादा बंद रखने के आरोप, और बिना किसी नियंत्रण के भारी फीस का ज़िक्र था।
इसीलिए जांच आपको खुद करनी है। ट्रिब्यून की ये रिपोर्ट पढ़ने लायक है, खास तौर पर तब जब आप कांगड़ा में कोई नशा मुक्ति केंद्र चुन रहे हों।
हिमाचल के नशा मुक्ति केंद्रों पर कब क्या हुआ, तारीखों के साथ
ये कोई डरावनी सूची नहीं है। ये दिखाने के लिए है कि सरकार और अदालत दोनों इन नशा मुक्ति केंद्रों पर नज़र रख रही हैं, और परिवार के तौर पर आपके सवाल पूछने का पूरा हक बनता है।
- 27 अगस्त 2020राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण ने सोलन ज़िले के परवाणू, कसौली उपमंडल में दो नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र बंद करा दिए। मरीज़ों की मौत के बाद हुई जांच में कमियां मिलीं, और ये भी सामने आया कि जो सेवाएं दी ही नहीं गईं, उनके पैसे लिए जा रहे थे। द ट्रिब्यून
- 17 सितंबर 2021प्राधिकरण ने बताया कि मार्च 2020 के बाद से 14 निजी नशा मुक्ति केंद्र बंद हुए। डेढ़ साल में पांच मरीज़ों की मौत दर्ज हुई, तीन सोलन में और दो ऊना में। प्राधिकरण ने ये भी कहा कि कुछ केंद्रों में पुनर्वास के नाम पर धमकी और मारपीट की शिकायतें आईं। द ट्रिब्यून
- 16 सितंबर 2021ऊना ज़िले के केंद्र पुलिस की निगरानी में आए। ज़िले में करीब 35 रजिस्टर्ड केंद्र थे और हर नशा मुक्ति केंद्र में 20 से 50 लोग रखे जा रहे थे, जिनमें से ज़्यादातर पंजाब से थे। द ट्रिब्यून
- 16 दिसंबर 2023परवाणू के पास कमली गांव में चल रहे एक पुनर्वास केंद्र का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया। 9 दिसंबर की रात 14 महिलाएं केंद्र से निकलकर जंगल की तरफ चली गई थीं। डीएसपी, एसडीएम और मुख्य चिकित्सा अधिकारी की टीम ने जांच में पाया कि कानून में तय सुविधाएं वहां थीं ही नहीं। द ट्रिब्यून
- 23 मार्च 2025कांगड़ा पर ट्रिब्यून की जांच रिपोर्ट छपी: लाइसेंस के बिना चल रहे केंद्र, मनोचिकित्सक और काउंसलर की कमी, बदसलूकी के आरोप और बिना नियंत्रण वाली फीस। द ट्रिब्यून
- 16 मई 2025हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार से ज़िलेवार हलफनामा मांगा कि हर ज़िले के नशा मुक्ति और उपचार केंद्रों में कितने कमरे हैं, कितने डॉक्टर हैं और कितना सहायक स्टाफ है। द ट्रिब्यून
- 30 सितंबर 2025सिरमौर के कोटला बरोग में 100 बिस्तरों वाले नशा मुक्ति केंद्र के लिए 5.34 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए। मंडी, लाहौल स्पीति, चंबा, सोलन और सिरमौर में भी केंद्र बनाने की बात कही गई। द ट्रिब्यून
- 3 दिसंबर 2025तीन साल में एनडीपीएस के 5,642 मामले दर्ज हुए और 8,216 लोग गिरफ्तार हुए। मामलों में 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, और ज़िला प्रशासनों से कहा गया कि नशे के पैसे से बनी संपत्तियां चिन्हित करें। द ट्रिब्यून
- 9 जून 2026शिमला के पास मशोबरा में नव जीवन महिला नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र शुरू हुआ, जो राज्य का पहला सरकारी महिला केंद्र है। द पॉलिसी एज
- 29 सितंबर 2026पड़ोस के पंजाब में समराला के पास एक ढाबे से चल रहा गैरकानूनी नशा मुक्ति केंद्र पकड़ा गया और 133 लोगों को छुड़ाया गया। पुलिस के मुताबिक संचालक इलाज के नाम पर परिवारों से हर महीने 25 से 30 लाख रुपये वसूल रहे थे। यूएनआई
अच्छी खबर ये है कि सरकार केंद्र बना भी रही है और पुराने केंद्रों की जांच भी करा रही है। बुरी खबर ये है कि जब तक जांच पहुंचती है, तब तक कुछ परिवार पैसे और भरोसा दोनों गंवा चुके होते हैं। इसीलिए पहले जांच आपको करनी है।
चीज़ 1: रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, क्योंकि हर नशा मुक्ति केंद्र का रजिस्टर्ड होना कानून है
ये सबसे पहली और सबसे ज़रूरी जांच है। बाकी सब बाद में।
कानून क्या कहता है
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 में नशे की लत को मानसिक बीमारी माना गया है, और नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र को मानसिक स्वास्थ्य संस्थान माना गया है। इसका सीधा मतलब ये है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था बिना रजिस्ट्रेशन के ऐसा नशा मुक्ति केंद्र नहीं चला सकती। हिमाचल में ये रजिस्ट्रेशन हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण देता है, जो शिमला से काम करता है।
प्राधिकरण पहले प्रोविजनल यानी अस्थायी रजिस्ट्रेशन देता है। ये बारह महीने चलता है और नवीनीकृत होता है। इस दौरान केंद्र को न्यूनतम मानक पूरे करने होते हैं। परमानेंट रजिस्ट्रेशन तभी मिलता है जब केंद्र ये साबित कर दे कि मानक पूरे हो रहे हैं।
कैसे जांचें
- सर्टिफिकेट की असली कॉपी हाथ में लेकर देखिए, मोबाइल पर आई फोटो से काम मत चलाइए।
- रजिस्ट्रेशन का सीरियल नंबर, जारी होने की तारीख और वैधता की तारीख नोट कर लीजिए।
- उस पर लिखा है कि प्रोविजनल है या परमानेंट, ये पढ़ लीजिए। दोनों कानूनी हैं, पर तारीख निकल चुकी हो तो सवाल बनता है।
- प्राधिकरण की वेबसाइट पर रजिस्टर्ड संस्थानों की सूची और न्यूनतम मानक दोनों मौजूद हैं।
- शक हो तो अपने ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दफ्तर में फोन करके पूछ लीजिए।
कोई बहाना मत सुनिए। आवेदन दे रखा है, फाइल दफ्तर में है, मालिक बाहर गए हैं, ये सब जवाब नहीं हैं। आवेदन देना और रजिस्ट्रेशन मिलना दो अलग बातें हैं। जिस नशा मुक्ति केंद्र के पास आज वैध रजिस्ट्रेशन नहीं है, वहां अपना बच्चा मत छोड़िए।
हमारा रजिस्ट्रेशन: ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट के पास हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, शिमला की प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन क्रमांक 193 है, जो 14 मई 2026 को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 66(4) और 66(11) के तहत जारी हुई। सर्टिफिकेट केंद्र पर देखा जा सकता है।
चीज़ 2: नशा मुक्ति केंद्र में डॉक्टर और मनोचिकित्सक कौन है, और कब मिलता है
नशे का इलाज सिर्फ अनुशासन और उपदेश से नहीं होता। इसमें दवाइयां लगती हैं, और दवाइयां डॉक्टर ही लिख सकता है।
क्या पूछना है
- डॉक्टर का नाम क्या है और उनका मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन नंबर क्या है।
- मनोचिकित्सक हफ्ते में कितनी बार आते हैं, या महीने में कितनी बार।
- रात को तबीयत बिगड़ जाए तो कौन देखेगा, और नज़दीकी अस्पताल कितनी दूर है।
- भर्ती के पहले दिन पूरी मेडिकल जांच होगी या नहीं।
ये सवाल बेवजह नहीं हैं। ट्रिब्यून की कांगड़ा रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कई नशा मुक्ति केंद्रों में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर ही नहीं हैं, जिससे इलाज की गुणवत्ता गिर जाती है।
डिप्रेशन की जांच क्यों ज़रूरी है
अमेरिका की राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय की स्वास्थ्य वेबसाइट मेडलाइनप्लस के मुताबिक डिटॉक्स करा रहे लोगों की डिप्रेशन और दूसरी मानसिक समस्याओं के लिए जांच होनी चाहिए, क्योंकि उनका इलाज करने से दोबारा नशे की तरफ लौटने का खतरा घटता है। कई युवा नशे के साथ साथ डिप्रेशन, घबराहट या किसी पुराने सदमे से भी जूझ रहे होते हैं। इसे समझने के लिए नशे का मनोविज्ञान पढ़िए।
चीज़ 3: डिटॉक्स डॉक्टर की निगरानी में होगा या कमरे में बंद करके
ये वो सवाल है जिसका जवाब परिवार अक्सर पूछते ही नहीं, और सबसे ज़्यादा तकलीफ यहीं होती है।
नशा छूटने पर शरीर के साथ क्या होता है
मेडलाइनप्लस के मुताबिक हेरोइन की आखिरी खुराक के करीब बारह घंटे के भीतर लक्षण शुरू हो सकते हैं। शुरू में बेचैनी, घबराहट, बदन दर्द, आंखों से पानी, नाक बहना, पसीना और जम्हाई आती है। बाद में पेट में मरोड़, दस्त, उल्टी, रोंगटे खड़े होना और पुतलियों का फैलना जुड़ जाता है।
यही वो तीन दिन हैं जब आदमी गिड़गिड़ाता है, गुस्सा करता है और भागने की कोशिश करता है। अच्छे नशा मुक्ति केंद्र में डॉक्टर दवाइयों से ये तकलीफ कम करते हैं, पानी की कमी पर नज़र रखते हैं और नींद वापस लाते हैं।
2020 में प्राधिकरण ने बताया था कि ऊना से ऐसी शिकायतें आई थीं जिनमें मरीज़ों के साथ मारपीट की गई और नशा छूटने के दौरान बिना दवा के उन्हें बंद रखा गया। अगर कोई केंद्र कहे कि दवा की ज़रूरत नहीं, बस तीन दिन काट लेगा, तो वहां मत छोड़िए।
शराब और नींद की गोलियों में खतरा ज़्यादा है
अगर लंबे समय से रोज़ शराब पी जा रही है या नींद की गोलियां चल रही हैं, तो अचानक बंद करने से दौरे पड़ सकते हैं और डेलीरियम ट्रेमेंस जैसी हालत बन सकती है, जो एक मेडिकल इमरजेंसी है। इसलिए शराब छुड़ाने की शुरुआत हमेशा डॉक्टर से होनी चाहिए। और पढ़िए: शराब की लत से रिकवरी।
डिटॉक्स के बाद का खतरा: मेडलाइनप्लस कहता है कि ओपिओइड से होने वाली ज़्यादातर ओवरडोज़ मौतें उन लोगों में होती हैं जिन्होंने अभी अभी डिटॉक्स पूरा किया हो, क्योंकि शरीर की सहनशक्ति गिर जाती है और पुरानी खुराक अब जानलेवा हो जाती है। इसीलिए सिर्फ डिटॉक्स कराकर घर ले आना अधूरा इलाज है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ओवरडोज़ का खतरा तब और बढ़ जाता है जब ओपिओइड के साथ शराब या सांस को धीमा करने वाली दवाइयां ली जाएं। इसलिए डॉक्टर को हर नशे के बारे में सच सच बताइए, एक भी चीज़ छुपाइए मत।
चीज़ 4: नशा मुक्ति केंद्र का स्टाफ कौन कौन है और उनकी पढ़ाई क्या है
किसी भी नशा मुक्ति केंद्र में असली काम स्टाफ करता है, मालिक नहीं। इसलिए स्टाफ से मिले बिना फैसला मत कीजिए।
नशा मुक्ति केंद्र में कम से कम कौन होना चाहिए
इलाज की तरफ
- डॉक्टर, जो दवाइयां लिखे और रोज़ाना देखे
- मनोचिकित्सक, जो डिप्रेशन और घबराहट भी देखे
- स्टाफ नर्स, जो दवा और हालत पर नज़र रखे
- फार्मासिस्ट, जो दवाइयों का हिसाब रखे
मन और आदत की तरफ
- मनोवैज्ञानिक, जो एक एक से बात करे
- काउंसलर, जो ग्रुप थेरेपी चलाए
- योग और फिटनेस सिखाने वाला
- कोई हुनर सिखाने वाला, ताकि लौटकर काम मिले
प्राधिकरण ने नशा उपचार और पुनर्वास केंद्रों के लिए न्यूनतम मानक तय कर रखे हैं, जिनमें स्टाफ की पढ़ाई और अनुभव भी शामिल है। उदाहरण के लिए, काउंसलिंग करने वाले के लिए मनोविज्ञान या समाज कार्य में स्नातक और नशा मुक्ति सेवाओं में छह महीने का अनुभव जैसी शर्तें रखी गई हैं।
एक सवाल जो बहुत कुछ बता देता है
पूछिए कि रात को केंद्र में कितने लोग ड्यूटी पर रहते हैं। अगर 30 लोगों पर रात को एक ही आदमी है, तो किसी की तबीयत बिगड़ने पर क्या होगा, ये आप खुद समझ सकते हैं।
चीज़ 5: नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती का तरीका कानूनी है या ज़बरदस्ती का
ये हिस्सा ध्यान से पढ़िए, क्योंकि यहीं सबसे ज़्यादा गड़बड़ होती है।
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती के दो कानूनी रास्ते
| तरीका | कब और कैसे |
|---|---|
| स्वतंत्र भर्ती, धारा 86 | जब व्यक्ति खुद भर्ती होने के लिए तैयार हो और अपने इलाज का फैसला ले सकता हो। यही आम और सामान्य रास्ता है। |
| सपोर्टेड भर्ती, धारा 89 | जब व्यक्ति को बहुत ज़्यादा सहारे की ज़रूरत हो और वो खुद फैसला लेने की हालत में न हो। ये तीस दिन तक के लिए होती है, योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की जांच और कानूनी सुरक्षा के साथ। |
धारा 22 के तहत मरीज़ और उसके नॉमिनेटेड रिप्रेजेंटेटिव को ये बताया जाना चाहिए कि भर्ती किस कानूनी आधार पर हुई है, और मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड से इसकी समीक्षा कैसे मांगी जा सकती है। बीमारी क्या है, क्या इलाज होगा और उसके क्या असर हो सकते हैं, ये भी ऐसी भाषा में बताना होता है जो आपको समझ आए।
उठाकर ले जाने वाली गाड़ी के बारे में
कुछ केंद्र पिकअप सेवा का विज्ञापन देते हैं, जिसमें रात को लोग आते हैं और आदमी को गाड़ी में डालकर ले जाते हैं। परिवार थक चुका होता है, इसलिए ये आसान रास्ता लगता है। पर बांधकर, पीटकर या घसीटकर ले जाना इलाज नहीं है, और ये अपराध भी हो सकता है। अगर आपको लगता है कि वो खुद को या किसी और को नुकसान पहुंचा सकता है, तो पहले किसी मनोचिकित्सक से बात कीजिए कि आपकी हालत में कानून क्या रास्ता देता है।
नॉमिनेटेड रिप्रेजेंटेटिव कौन होगा, ये पहले तय कर लीजिए
परिवार में से कोई एक व्यक्ति तय कर लीजिए जो जानकारी लेगा, कागज़ देखेगा और फैसलों में शामिल रहेगा। बार बार अलग अलग लोगों के फोन करने से बात उलझती है और मरीज़ का भरोसा भी डगमगाता है।
चीज़ 6: मरीज़ के कानूनी हक, जो हर नशा मुक्ति केंद्र को मानने ही हैं
बहुत से परिवार सोचते हैं कि भर्ती के बाद सब कुछ केंद्र के हाथ में है। ऐसा नहीं है। कानून ने मरीज़ को साफ साफ हक दिए हैं।
ज़ंजीर पूरी तरह मना है
धारा 95 के तहत किसी भी मानसिक बीमारी वाले व्यक्ति को किसी भी तरह से ज़ंजीर से बांधना मना है। कानून में शब्द साफ हैं, किसी भी रूप में नहीं।
अकेले कमरे में बंद करना मना है
धारा 97 के तहत एकांत कारावास और अकेले कमरे में बंद रखना मना है। शारीरिक रोक सिर्फ आखिरी उपाय के तौर पर, तुरंत होने वाले नुकसान को रोकने के लिए, और इलाज कर रहे मनोचिकित्सक की अनुमति से हो सकती है।
रोक सज़ा नहीं बन सकती
इसी धारा में लिखा है कि रोक को सज़ा या डराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, और स्टाफ की कमी इसका बहाना नहीं हो सकती। हर बार का तरीका, वजह और समय रिकॉर्ड में लिखना ज़रूरी है।
परिवार को 24 घंटे में बताना होगा
अगर किसी मरीज़ पर शारीरिक रोक लगाई जाती है, तो उसके नॉमिनेटेड रिप्रेजेंटेटिव को 24 घंटे के भीतर बताना होगा, और ऐसी हर घटना महीने की रिपोर्ट में बोर्ड को भेजनी होगी।
सम्मान से रहने का हक
धारा 20 के तहत साफ सफाई, शौचालय, निजता और ढंग के कपड़े हक हैं। ज़बरदस्ती सिर मुंडवाना, ज़बरदस्ती वर्दी पहनाना और बिना मेहनताने के काम करवाना मना है।
गोपनीयता का हक
धारा 23 के तहत इलाज से जुड़ी जानकारी गुप्त रखनी होती है। धारा 24 कहती है कि मरीज़ की फोटो या जानकारी उसकी सहमति के बिना मीडिया को नहीं दी जा सकती।
अगर कहीं इन हकों का उल्लंघन दिखे, तो शिकायत का रास्ता नीचे सरकारी मदद वाले हिस्से में दिया गया है। कानून का पूरा पाठ इंडिया कोड पर मौजूद है।
चीज़ 7: नशा मुक्ति केंद्र की फीस लिखित में लीजिए, और उसमें क्या शामिल है
हिमाचल में निजी नशा मुक्ति केंद्रों की फीस पर कोई तय सरकारी रेट नहीं है। ट्रिब्यून की कांगड़ा रिपोर्ट में यही कहा गया था कि फीस भारी है और उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए पैसे की बात शुरू में ही साफ कर लेना समझदारी है, बाद में नहीं।
ये पांच चीज़ें लिखवा लीजिए
- महीने की फीस कितनी हैऔर कमरा साझा है या अकेला, ये उसमें साफ लिखा हो।
- डिटॉक्स का चार्ज अलग है या नहींऔर वो एक बार लगेगा या बार बार।
- दवाइयां फीस में हैं या नहींक्योंकि महीने भर की दवा का खर्च कम नहीं होता।
- क्या क्या अलग से लगेगाजैसे अस्पताल रेफरल, लैब जांच या गाड़ी का खर्च।
- बीच में छोड़ना पड़े तो क्या होगापैसा वापस होगा या नहीं, ये पहले ही पूछ लीजिए।
सितंबर 2026 में पंजाब के समराला के पास एक ढाबे से चल रहा गैरकानूनी केंद्र पकड़ा गया था, जहां से 133 लोगों को छुड़ाया गया। पुलिस के मुताबिक संचालक इलाज के नाम पर परिवारों से हर महीने 25 से 30 लाख रुपये तक वसूल रहे थे। हर भुगतान की रसीद लीजिए, चाहे रकम छोटी हो।
हमारी अपनी फीस इस पेज पर नीचे लिखी है, और हिमाचल में रिहैब सेंटर की फीस वाले पेज पर भी। हम पहले फोन पर ही पूरी फीस बता देते हैं।
चीज़ 8: नशा मुक्ति केंद्र का कमरा, सफाई, खाना और खुली जगह खुद देखिए
फोटो और वीडियो से धोखा हो जाता है। एक बार जाकर देख लेना सबसे अच्छी जांच है।
मानकों में क्या लिखा है
प्राधिकरण के न्यूनतम मानकों में साफ लिखा है कि हर बिस्तर के लिए कम से कम 60 वर्ग फुट जगह होनी चाहिए, जिसमें मनोरंजन, थेरेपी और काउंसलिंग की जगह भी गिनी जाती है। 20 मरीज़ों के लिए कम से कम 2000 वर्ग फुट का निर्मित क्षेत्र होना चाहिए। बच्चों और किशोरों को बड़ों से अलग रखना ज़रूरी है, और मरीज़ों का सामान सुरक्षित रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। जगह ऐसी हो जहां पहुंचना आसान हो, हवा आए और शौचालय की ठीक व्यवस्था हो।
जाकर ये देखिए
- कमरे में कितने बिस्तर हैं और उनके बीच कितनी जगह है।
- शौचालय कितने हैं और कितने लोगों पर हैं।
- रसोई देखिए और उस दिन का खाना पूछिए, हो सके तो देखिए।
- खिड़कियां हैं या नहीं, धूप और हवा आती है या नहीं।
- योग, टहलने और खेलने के लिए खुली जगह है या नहीं।
- पीने का पानी और गर्म पानी की क्या व्यवस्था है, सर्दियों में कांगड़ा ठंडा होता है।
- दीवार पर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और शिकायत का तरीका लगा है या नहीं।
ऊना में 2021 में पुलिस ने प्राधिकरण को लिखा था कि केंद्रों में मरीज़ों के साथ बदसलूकी की जांच करवाई जाए। उस समय ज़िले में करीब 35 रजिस्टर्ड केंद्र थे और हर नशा मुक्ति केंद्र में 20 से 50 लोग रखे जा रहे थे। भीड़ और जगह का सीधा रिश्ता है।
चीज़ 9: मिलने, फोन और फैमिली काउंसलिंग के नियम पहले पूछिए
मां बाप के लिए सबसे मुश्किल हिस्सा यही होता है। बेटा अंदर है और खबर नहीं मिल रही, तो रात कटती नहीं।
क्या पूछना है
- मुलाकात कब और कितनी देर के लिए होती है।
- फोन पर बात कब और कितनी बार हो सकती है।
- शुरुआती कुछ दिन मुलाकात बंद रहती है तो कितने दिन और क्यों।
- फैमिली काउंसलिंग होती है या नहीं, और कौन कराता है।
- अगर तबीयत बिगड़े तो परिवार को कितनी देर में खबर दी जाएगी।
कई केंद्र डिटॉक्स के शुरुआती दिनों में मुलाकात सीमित रखते हैं, ताकि मरीज़ टिक सके। ये अपने आप में गलत नहीं है। गलत तब है जब ये नियम आपको पहले न बताया जाए, या जब जवाब हर बार बदल जाए।
परिवार कभी नहीं मिल सकता। फोन की इजाज़त कभी नहीं है। अंदर आने की अनुमति नहीं है। छह महीने तक कोई संपर्क नहीं। ऐसे जवाब देने वाले केंद्र से दूर रहिए। कांगड़ा पर ट्रिब्यून की रिपोर्ट में छह महीने या उससे ज़्यादा बंद रखने के आरोपों का ज़िक्र था।
फैमिली काउंसलिंग कोई औपचारिकता नहीं है। घर का माहौल नहीं बदला तो लौटने के बाद वही पुरानी बात शुरू हो जाती है। इसीलिए अच्छे नशा मुक्ति केंद्र परिवार को भी प्रक्रिया में जोड़ते हैं।
चीज़ 10: प्रोग्राम कितने दिन का है और डिस्चार्ज के बाद क्या होगा
15 दिन में नशा छुड़ाने वाले विज्ञापन सबसे ज़्यादा दिखते हैं, और सबसे कम काम आते हैं।
नशा मुक्ति केंद्र में डिटॉक्स और पुनर्वास एक चीज़ नहीं हैं
डिटॉक्स में करीब एक हफ्ता लगता है और उससे सिर्फ नशा शरीर से निकलता है। आदतें, सोच, दोस्तों का घेरा और वो रास्ते जहां से नशा मिलता था, ये सब वहीं के वहीं रहते हैं। मेडलाइनप्लस भी कहता है कि ज़्यादातर लोगों को डिटॉक्स के बाद लगातार सहारे की ज़रूरत रहती है, जैसे सहायता समूह, काउंसलिंग या भर्ती रहकर इलाज।
ये पूछिए
- प्रोग्राम कितने दिन का है और उसमें क्या क्या होता है।
- लिखित इलाज योजना मिलेगी या नहीं।
- डिस्चार्ज का फैसला कौन करता है और किस आधार पर।
- घर लौटने के बाद फॉलोअप कैसे होगा और कितने समय तक।
- दोबारा फिसलने पर क्या करना है, इसकी लिखित योजना मिलेगी या नहीं।
हमारा प्रोग्राम 180 दिन का है और आठ चरणों में चलता है। विस्तार से जानने के लिए रिहैब सेंटर में क्या होता है पढ़िए।
- भर्ती और पूरी जांचमेडिकल, मानसिक और पारिवारिक इतिहास, और एक निजी इलाज योजना।
- डॉक्टर की निगरानी में डिटॉक्सदवाइयों, तरल पदार्थों और आराम के साथ सुरक्षित तरीके से।
- मनोचिकित्सा और थेरेपीडिप्रेशन, घबराहट या पुराने सदमे का इलाज, और एक एक से काउंसलिंग।
- 12 स्टेप और ग्रुप थेरेपीरोज़ाना ग्रुप, जहां लोग एक दूसरे की सच्चाई से सीखते हैं।
- योग, ध्यान और फिटनेसएक तय दिनचर्या, जो शरीर को वापस खड़ा करती है।
- फैमिली काउंसलिंगसेशन जिनमें परिवार भी साथ साथ संभलता है।
- रिलैप्स से बचावट्रिगर पहचानना, मना करना सीखना और घर के लिए योजना बनाना।
- आफ्टरकेयर और फॉलोअपघर लौटने के बाद भी चलने वाला सहारा।
हम न 100 प्रतिशत इलाज का दावा करते हैं और न कोई सफलता दर गिनाते हैं, क्योंकि कोई ईमानदार केंद्र ऐसा नहीं कर सकता। लंबा प्रोग्राम जो देता है वो है समय: शरीर को ठीक होने का, दिमाग को साफ होने का, और परिवार को साथ साथ संभलने का।
नशा मुक्ति केंद्र को फोन करें तो ये सवाल ज़रूर पूछें
ये सूची फोन में सेव कर लीजिए या कागज़ पर उतार लीजिए। हर नशा मुक्ति केंद्र से यही सवाल पूछिए। एक एक करके पूछिए, और जवाब लिखते जाइए। जो नशा मुक्ति केंद्र जवाब देने में घबराए, वहीं से आपको अपना जवाब मिल जाएगा।
- आपका राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण का रजिस्ट्रेशन नंबर क्या है और कब तक वैध है।
- डॉक्टर कौन हैं, उनका रजिस्ट्रेशन नंबर क्या है, और वो कब कब आते हैं।
- मनोचिकित्सक महीने में कितनी बार देखते हैं।
- डिटॉक्स में कौन सी दवाइयां दी जाती हैं और कौन देता है।
- रात को कितने स्टाफ ड्यूटी पर रहते हैं।
- इस समय कितने लोग भर्ती हैं और कुल कितने बिस्तर हैं।
- महीने की फीस कितनी है और उसमें क्या क्या शामिल है।
- डिटॉक्स और दवाइयों का खर्च अलग है या नहीं।
- भर्ती सहमति से होगी या सपोर्टेड भर्ती होगी, और कागज़ कौन से बनेंगे।
- मुलाकात और फोन का नियम क्या है, लिखित में मिलेगा या नहीं।
- फैमिली काउंसलिंग होती है या नहीं, और कितनी बार।
- प्रोग्राम कितने दिन का है और डिस्चार्ज के बाद फॉलोअप कैसे होता है।
- शिकायत करनी हो तो किससे करें, और वो नंबर कहां लिखा है।
- क्या हम केंद्र आकर कमरे और रसोई देख सकते हैं।
एक छोटी सी तरकीब: आखिरी सवाल सबसे अहम है। जो नशा मुक्ति केंद्र आपको आकर देखने के लिए कहे, वो आधी जांच खुद ही पास कर गया।
खतरे के संकेत: ऐसा नशा मुक्ति केंद्र दिखे तो वहीं से लौट आइए
इनमें से एक भी बात किसी नशा मुक्ति केंद्र में दिखे तो रुक जाइए। परिवार की हालत चाहे जितनी मुश्किल हो, गलत जगह भर्ती कराने से हालात और बिगड़ते हैं।
- 100 प्रतिशत इलाज, पक्का इलाज या गारंटी का दावा।
- 15 दिन में नशा छुड़ाने का वादा।
- रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दिखाने से इनकार या टालमटोल।
- कोई डॉक्टर या मनोचिकित्सक रिकॉर्ड में नहीं।
- उठाकर ले जाने वाली गाड़ी या पिकअप सेवा का ऑफर।
- परिवार को अंदर जाने, कमरे देखने या मिलने की इजाज़त नहीं।
- सिर्फ नकद पैसे, और कोई रसीद नहीं।
- ज़ंजीर, ताले, सलाखें या मारपीट के निशान।
- सबका सिर मुंडा हुआ, सबको एक जैसी वर्दी पहनाई गई।
- फीस हर बार बदल जाए, और लिखित में कुछ न मिले।
- दूसरों की मेडिकल फाइलें खुली पड़ी हों, किसी की निजता की परवाह नहीं।
इनमें से कई बातें सिर्फ पसंद नापसंद की नहीं हैं, कानून की हैं। ज़ंजीर धारा 95 में मना है, एकांत कमरा धारा 97 में, और सिर मुंडवाना धारा 20 में।
सरकारी मदद, हेल्पलाइन और कांगड़ा के आसपास के नशा मुक्ति केंद्र
आप निजी नशा मुक्ति केंद्र चुनें या न चुनें, ये नंबर आज ही फोन में सेव कर लीजिए। ये मुफ्त हैं और इन पर बात करने से कोई रिकॉर्ड खराब नहीं होता।
| नंबर या सेवा | किस काम के लिए |
|---|---|
| 14446 | नशा मुक्ति के लिए राष्ट्रीय टोल फ्री हेल्पलाइन, जो नशा मुक्त भारत अभियान के तहत काउंसलिंग और रेफरल देती है |
| 14416 या 1-800-891-4416 | टेली मानस: भारत सरकार की मुफ्त 24x7 मानसिक स्वास्थ्य मदद, आपकी अपनी भाषा में |
| 112 | पुलिस, आग और एंबुलेंस के लिए आपातकालीन नंबर। हिमाचल में परिवार नशे की मदद मांगने के लिए भी इसका इस्तेमाल करते हैं |
| 108 | मेडिकल इमरजेंसी और ओवरडोज़ के लिए एंबुलेंस |
| 1933 | नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की मानस हेल्पलाइन, नशे की तस्करी की सूचना देने के लिए |
| ड्रग फ्री हिमाचल ऐप | हिमाचल पुलिस का ऐप, जिस पर बिना नाम बताए नशा बेचने की सूचना दी जा सकती है |
कांगड़ा और आसपास के सरकारी नशा मुक्ति केंद्र
- ज़िला नशा मुक्ति केंद्र, प्रयास भवन, धर्मशाला, जिसे ज़िला रेड क्रॉस सोसाइटी कांगड़ा चलाती है: 01892-224408
- नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र, नूरपुर, जो रेड क्रॉस के ही अधीन है: 01893-221200
- ज़िला रेड क्रॉस कार्यालय, धर्मशाला: 01892-224888। प्राधिकरण की रजिस्टर्ड संस्थानों की सूची में इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी धर्मशाला और नूरपुर का आईआरसीए नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र, दोनों दर्ज हैं
- डॉ राजेंद्र प्रसाद राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय, टांडा: यहां का मानसिक स्वास्थ्य उत्कृष्टता केंद्र राज्य में नशा मुक्ति और पुनर्वास के लिए नोडल संस्थान बनाया गया है
- दिशा केंद्र: हिमाचल के स्वास्थ्य संस्थानों में काउंसलिंग और शुरुआती मदद के लिए खोले गए केंद्र
- महिलाओं के लिए: शिमला के पास मशोबरा में नव जीवन महिला नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र, जो 9 जून 2026 को शुरू हुआ
सरकारी विकल्प ढूंढने का सबसे भरोसेमंद तरीका ये है कि प्राधिकरण की रजिस्टर्ड संस्थानों की सूची देखें, या राष्ट्रीय हेल्पलाइन 14446 पर फोन करके अपने ज़िले का विकल्प पूछ लें। जाने से पहले उस नशा मुक्ति केंद्र में फोन करके बिस्तर की उपलब्धता ज़रूर पूछ लीजिए। सरकारी विकल्पों की पूरी जानकारी हमारे हिमाचल में सरकारी नशा मुक्ति केंद्र वाले पेज पर है।
ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट एक निजी, रजिस्टर्ड चैरिटेबल केंद्र है। हमें ये ज़्यादा अच्छा लगेगा कि परिवार को कहीं न कहीं मदद मिल जाए, बजाय इसके कि कहीं न मिले। इसलिए अगर ऊपर का कोई विकल्प आपके हालात में ज़्यादा ठीक बैठता है, तो वहीं जाइए।
शिकायत कहां करें
अगर किसी नशा मुक्ति केंद्र में बदसलूकी, मारपीट या कानून के खिलाफ कुछ हो रहा है, तो राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण को लिखिए, क्योंकि रजिस्ट्रेशन वही देता है और वापस भी लेता है। ज़िले में निरीक्षण टीम मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अगुवाई में बनती है, जिसमें एसडीएम, डीएसपी और एक मनोचिकित्सक होते हैं, इसलिए ज़िला प्रशासन को भी शिकायत दीजिए। मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड का रास्ता भी खुला है। किसी को तुरंत खतरा हो तो 112 पर कॉल कीजिए।
अगर मरीज़ पर एनडीपीएस का केस है तो नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती से क्या फर्क पड़ता है
बहुत से परिवार इसी डर से इलाज टालते रहते हैं कि कहीं पुलिस का मामला न बन जाए। कानून में इसका एक रास्ता दिया गया है।
स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, जिसे एनडीपीएस कहा जाता है, उसकी धारा 64A में राहत दी गई है। राजस्व विभाग के मुताबिक जो व्यक्ति नशे का आदी है और उस पर सेवन का मामला है या कम मात्रा से जुड़ा मामला है, वो अगर सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा चलाए या मान्यता प्राप्त अस्पताल या संस्थान से अपनी मर्ज़ी से नशा मुक्ति का इलाज कराता है और उसे पूरा करता है, तो उस पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।
दो बातें ध्यान में रखिए। पहली, ये राहत सिर्फ कम मात्रा और सेवन वाले मामलों के लिए है, बड़ी मात्रा के लिए नहीं। दूसरी, इलाज अधूरा छोड़ने पर ये छूट वापस भी ली जा सकती है। अपने केस में ये कैसे लागू होगा, ये किसी वकील से ज़रूर पूछ लीजिए, क्योंकि हर मामला अलग होता है।
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती वाले दिन क्या साथ ले जाएं और क्या उम्मीद रखें
भर्ती का दिन पूरे परिवार के लिए भारी होता है। थोड़ी तैयारी उसे आसान बना देती है।
नशा मुक्ति केंद्र ले जाने के लिए कागज़ और सामान
हर नशा मुक्ति केंद्र की ज़रूरत थोड़ी अलग होती है, इसलिए फोन पर पूरी सूची पहले मांग लीजिए। आम तौर पर मरीज़ का पहचान पत्र, परिवार के ज़िम्मेदार सदस्य का पहचान पत्र, पासपोर्ट साइज़ फोटो और पहले हुए इलाज की पर्चियां काम आती हैं। जो दवाइयां वो पहले से ले रहा है, उन्हें डिब्बे सहित ले जाइए, क्योंकि डॉक्टर को ये जानना ज़रूरी है कि शरीर में पहले से क्या जा रहा है।
पहले दिन क्या होना चाहिए
- पूरी जांचक्या लेते हैं, कितना, कब से, पहले कोई इलाज हुआ या नहीं, कोई बीमारी या चोट है या नहीं।
- कानूनी आधार बताया जाएभर्ती सहमति से है या सपोर्टेड, ये आपको और मरीज़ को साफ बताया जाना चाहिए।
- इलाज योजनाक्या होगा, कितने दिन में क्या उम्मीद है, ये लिखकर मिलना चाहिए।
- सामान की सूचीमोबाइल, पर्स और कपड़े जमा होते हैं तो उनकी लिखित सूची बननी चाहिए।
- संपर्क का नियमअगली बार बात कब होगी और किस नंबर पर, ये तय करके आइए।
खुद को भी संभालिए
छोड़कर लौटते वक्त अपराधबोध होता है, कई बार आंसू भी आते हैं। ये सामान्य है। आपने उसे छोड़ा नहीं है, आपने इलाज शुरू कराया है। घर जाकर खुद भी आराम कीजिए, और जो तनाव महीनों से जमा है उसके लिए तनाव और घबराहट के लिए योग आज़माइए।
कांगड़ा, पालमपुर और धर्मशाला में नशा मुक्ति केंद्र ढूंढते समय
ज़्यादातर परिवार संकट की घड़ी में गूगल पर नशा मुक्ति केंद्र नियर मी या पास का नशा मुक्ति केंद्र लिखते हैं। नज़दीक होना मायने रखता है, क्योंकि मां बाप और पत्नी को मिलने आना होता है और फैमिली काउंसलिंग में बैठना होता है।
पर एक दूसरी दूरी भी मायने रखती है। ठीक होने के लिए उसे कुछ समय अपने पुराने दोस्तों, बेचने वाले और उन्हीं रास्तों से दूर रहना पड़ता है। इसलिए न इतना पास कि पुराना माहौल पीछा न छोड़े, न इतना दूर कि परिवार आ ही न पाए।
ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट कांगड़ा ज़िले में, टांडा खोली गांव में है, एफसीआई गोदाम के पास और डॉ राजेंद्र प्रसाद राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय टांडा के नज़दीक। आपके इलाके के हिसाब से ये पेज देखिए:
कांगड़ा घाटी और आसपास के परिवारों के लिए सेवा।
अगर आपको पहले ये समझना है कि नशा मुक्ति केंद्र और रिहैब सेंटर में कोई फर्क है या नहीं, तो ये तुलना पढ़िए। और चिट्टे का इलाज कांगड़ा में कैसे होता है, ये इस पेज पर समझाया गया है।
वो गलतफहमियां जो परिवारों को गलत नशा मुक्ति केंद्र तक पहुंचा देती हैं
गलतफहमी: जो नशा मुक्ति केंद्र सबसे सख्ती करता है, वही सबसे अच्छा है।
सख्त दिनचर्या अच्छी बात है। पर मारपीट, ज़ंजीर और एकांत कमरा सख्ती नहीं, कानून का उल्लंघन है। धारा 95 और 97 इन्हें साफ मना करती हैं।
गलतफहमी: जो सबसे महंगा है, वही सबसे अच्छा है।
हिमाचल में फीस पर कोई तय नियंत्रण नहीं है, इसलिए ज़्यादा फीस अपने आप अच्छे इलाज की गारंटी नहीं है। रजिस्ट्रेशन, डॉक्टर और स्टाफ देखिए, रेट कार्ड नहीं।
गलतफहमी: 15 दिन में काम हो जाएगा।
15 दिन में बस शरीर से नशा निकलता है। आदत, सोच और माहौल बदलने में महीने लगते हैं, और उसके बाद भी सहारा चाहिए होता है।
गलतफहमी: उसे ज़बरदस्ती भर्ती करा देंगे तो ठीक हो जाएगा।
कानून में भर्ती आम तौर पर सहमति से होती है। ज़बरदस्ती उठाकर ले जाना इलाज नहीं है और भरोसा भी तोड़ देता है। पहले मनोचिकित्सक से बात कीजिए।
गलतफहमी: सरकारी नशा मुक्ति केंद्र में तो कुछ होता ही नहीं।
कांगड़ा में रेड क्रॉस के केंद्र चल रहे हैं और टांडा मेडिकल कॉलेज को नोडल संस्थान बनाया गया है। पहले फोन करके पूछ तो लीजिए।
गलतफहमी: भर्ती करा दिया, अब हमारा काम खत्म।
फैमिली काउंसलिंग और घर का माहौल इलाज का हिस्सा हैं। घर नहीं बदला तो लौटने के बाद वही पुरानी कहानी शुरू हो जाती है।
ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट: हिमाचल के परिवारों के लिए सस्ता नशा मुक्ति केंद्र
ये ट्रस्ट क्यों बना
ईशान पठानिया, ट्रस्ट के संस्थापक और प्रबंध न्यासी, खुद पांच साल से रिकवरी में हैं। उन्हें पता है कि नशा एक नौजवान के साथ क्या करता है, और उससे प्यार करने वालों के साथ क्या करता है।
उन्होंने एक और बात देखी। हिमाचल के बहुत से परिवार निजी नशा मुक्ति केंद्रों की फीस दे ही नहीं सकते थे, इसलिए या तो उनके बेटे इलाज से रह जाते थे, या सस्ती और बिना रजिस्ट्रेशन वाली जगहों पर पहुंच जाते थे, जहां फायदे से ज़्यादा नुकसान होता था। इसका जवाब था एक रजिस्टर्ड और डॉक्टर की निगरानी वाला नशा मुक्ति केंद्र, जिसकी फीस आम हिमाचली परिवार दे सके, और जो फीस पहले फोन पर ही साफ बता दे।
इसी सोच से ये ट्रस्ट बना, और इसी वजह से हम फीस जितनी कम रख सकते हैं उतनी रखते हैं। ईशान खुद केंद्र चलाने में शामिल रहते हैं, और यहां रहने वाले जानते हैं कि वो किसी ऐसे इंसान से बात कर रहे हैं जो खुद उसी जगह बैठ चुका है।
हमारी फीस, साफ साफ
| प्लान | कमरा और खाना | फीस |
|---|---|---|
| शेयर्ड रेज़िडेंशियल केयर | साझा कमरा, सामान्य खाना | 12,500 रुपये प्रति माह |
| बी केयरिंग | डीलक्स कमरा, दो लोगों के लिए, बेहतर खाना | 25,000 रुपये प्रति माह |
| ए केयरिंग | निजी कमरा, अकेले के लिए, बेहतर खाना | 40,000 रुपये प्रति माह |
| डॉक्टर की निगरानी वाला डिटॉक्स | भर्ती के समय एक बार | 6,000 रुपये एक बार |
इलाज तीनों प्लान में बिल्कुल एक जैसा है। सिर्फ कमरा और खाना बदलता है। हर प्लान में रहना और खाना, लिखी गई दवाइयां, डॉक्टर और मनोचिकित्सक की जांच, काउंसलिंग, ग्रुप थेरेपी, योग, फिटनेस, सभी गतिविधियां और फैमिली काउंसलिंग शामिल हैं। केंद्र के बाहर की कोई चीज़, जैसे अस्पताल रेफरल या गाड़ी, परिवार से पहले बात करके ही की जाती है। और जानकारी हिमाचल का सबसे किफायती नशा मुक्ति केंद्र पेज पर है।
जो आप खुद जांच सकते हैं
- हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, शिमला: प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन क्रमांक 193, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 66(4) और 66(11) के तहत, 14 मई 2026 को जारी। सर्टिफिकेट केंद्र पर देखा जा सकता है।
- रजिस्टर्ड चैरिटेबल ट्रस्ट: रजि. नं. 2025/19/IV/123, बुक नं. IV, खंड 4067, उप पंजीयक कार्यालय 1, कश्मीरी गेट, दिल्ली, 14 फरवरी 2025।
- 180 दिन का, आठ चरणों वाला प्रोग्राम, जो डॉक्टर की निगरानी में डिटॉक्स से शुरू होता है।
- टीम में मनोवैज्ञानिक, एमएसडब्ल्यू काउंसलर, फार्मासिस्ट, स्टाफ नर्स, योग एवं वेलनेस प्रशिक्षक और व्यावसायिक प्रशिक्षक शामिल हैं।
- फोन और व्हाट्सऐप 24x7 खुला है: +91 62304 15581।
हम किसे भर्ती करते हैं
हमारा केंद्र आवासीय है और सिर्फ पुरुषों के लिए है, उम्र 18 साल या उससे ऊपर, ऊपर की कोई सीमा नहीं। हम चिट्टा, हेरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर, शराब, चरस, गांजा, भांग, अफीम, डोडा, भुक्की, ट्रामाडोल, कोडीन सिरप, अल्प्राजोलम, कोकीन, एमडीएमए, इंजेक्शन से नशा और एक साथ कई नशों का इलाज करते हैं। महिलाओं के लिए ऊपर बताया गया नव जीवन केंद्र देखिए, या टेली मानस 14416 पर बात कीजिए।
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती को लेकर परिवार अक्सर यही पूछते हैं
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराने से पहले सबसे पहले क्या देखना चाहिए?
सबसे पहले उस नशा मुक्ति केंद्र का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट देखिए। हिमाचल में हर नशा मुक्ति केंद्र का हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण में रजिस्टर्ड होना कानून से ज़रूरी है। सर्टिफिकेट पर नंबर, तारीख और वैधता देखें। उसके बाद डॉक्टर कौन है, डिटॉक्स कैसे होगा, फीस लिखित में क्या है, और मिलने के नियम क्या हैं, ये पूछें। पैसे देने से पहले सेंटर खुद जाकर देखें।
हिमाचल में नशा मुक्ति केंद्र का रजिस्ट्रेशन कैसे चेक करें?
नशा मुक्ति केंद्र से रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट मांगिए और उसका सीरियल नंबर, जारी होने की तारीख और वैधता नोट कर लीजिए। फिर हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की वेबसाइट hpsmha.hp.gov.in पर रजिस्टर्ड संस्थानों की सूची देखिए, या प्राधिकरण से शिमला में पुष्टि कर लीजिए। आप अपने ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दफ्तर से भी पूछ सकते हैं। जो सेंटर सर्टिफिकेट दिखाने से बचे, वहां भर्ती मत कराइए।
प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन और परमानेंट रजिस्ट्रेशन में क्या फर्क है?
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के तहत प्राधिकरण पहले प्रोविजनल यानी अस्थायी रजिस्ट्रेशन देता है। ये बारह महीने के लिए मान्य होता है और इसे दोबारा नवीनीकृत कराया जा सकता है। इस दौरान नशा मुक्ति केंद्र को तय किए गए न्यूनतम मानक पूरे करने होते हैं। परमानेंट रजिस्ट्रेशन तभी मिलता है जब सेंटर ये साबित कर दे कि वो मानक पूरे कर रहा है। दोनों कानूनी हैं, पर कोई रजिस्ट्रेशन न होना कानूनी नहीं है।
क्या बिना मरीज़ की मर्ज़ी के नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया जा सकता है?
आम तौर पर भर्ती मरीज़ की अपनी सहमति से होती है, जिसे कानून में स्वतंत्र भर्ती कहते हैं और ये धारा 86 के तहत आती है। जब व्यक्ति को बहुत ज़्यादा सहारे की ज़रूरत हो और वो खुद फैसला लेने की हालत में न हो, तब धारा 89 के तहत सपोर्टेड भर्ती तीस दिन तक हो सकती है, वो भी योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की जांच और कानूनी सुरक्षा के साथ। रात को गाड़ी भेजकर उठा ले जाना इलाज नहीं है। पहले किसी मनोचिकित्सक से बात कीजिए।
क्या सेंटर मरीज़ को ज़ंजीर से बांध सकता है या अकेले कमरे में बंद कर सकता है?
नहीं। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 95 किसी भी तरह से ज़ंजीर से बांधने पर रोक लगाती है। धारा 97 अकेले कमरे में बंद रखने और एकांत कारावास पर रोक लगाती है। शारीरिक रोक सिर्फ आखिरी उपाय के तौर पर, तुरंत होने वाले नुकसान को रोकने के लिए, और इलाज कर रहे मनोचिकित्सक की अनुमति से ही हो सकती है। उसे सज़ा के तौर पर या स्टाफ की कमी की वजह से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
क्या नशा मुक्ति केंद्र मरीज़ का सिर मुंडवा सकता है या बिना पैसे के काम करवा सकता है?
नहीं। धारा 20 के तहत हर व्यक्ति को सम्मान से जीने का हक है और क्रूर या अपमानजनक व्यवहार से सुरक्षा मिली हुई है। इसी धारा में साफ लिखा है कि ज़बरदस्ती सिर मुंडवाना, ज़बरदस्ती संस्थान की वर्दी पहनाना और बिना मेहनताने के ज़बरदस्ती काम करवाना मना है। साफ सफाई, शौचालय, निजता और ढंग के कपड़े भी मरीज़ का हक हैं।
डिटॉक्स डॉक्टर की निगरानी में क्यों होना चाहिए?
नशा अचानक छूटने पर शरीर में तकलीफ शुरू हो जाती है। मेडलाइनप्लस के मुताबिक हेरोइन की आखिरी खुराक के करीब बारह घंटे के भीतर लक्षण शुरू हो सकते हैं, और बेचैनी, बदन दर्द, पेट में मरोड़, दस्त और उल्टी होती है। डॉक्टर दवाइयों से ये तकलीफ कम कर सकते हैं और पानी की कमी या डिप्रेशन पर नज़र रख सकते हैं। अगर साथ में शराब या नींद की गोलियों की लत है तो अचानक बंद करने से दौरे तक पड़ सकते हैं, इसलिए डिटॉक्स डॉक्टर की निगरानी में ही कराइए।
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराने का खर्च कितना आता है?
हिमाचल में फीस एक नशा मुक्ति केंद्र से दूसरे में अलग अलग है और राज्य में इसका कोई तय रेट नहीं है। द ट्रिब्यून की मार्च 2025 की कांगड़ा रिपोर्ट में बताया गया था कि परिवारों से भारी फीस ली जाती है और कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए भर्ती से पहले फीस लिखित में लीजिए, पूछिए कि उसमें क्या शामिल है और क्या नहीं, और हर भुगतान की रसीद लीजिए। ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट में शेयर्ड रेज़िडेंशियल केयर 12,500 रुपये प्रति माह है।
फीस में क्या क्या शामिल होना चाहिए?
फीस में रहना, खाना, डॉक्टर और मनोचिकित्सक की जांच, लिखी गई दवाइयां, काउंसलिंग, ग्रुप थेरेपी, योग और फैमिली काउंसलिंग शामिल होनी चाहिए। डिटॉक्स का चार्ज अलग है या नहीं, ये पहले पूछ लीजिए। बाहर की चीज़ें जैसे अस्पताल रेफरल, जांच या गाड़ी का खर्च आमतौर पर अलग होता है, इसलिए लिखवा लीजिए कि कौन सी चीज़ अलग से लगेगी।
15 दिन या 30 दिन का प्रोग्राम काफी है क्या?
डिटॉक्स में करीब एक हफ्ता लगता है और उससे सिर्फ नशा शरीर से निकलता है। मेडलाइनप्लस के मुताबिक ज़्यादातर लोगों को डिटॉक्स के बाद लगातार सहारे की ज़रूरत रहती है, जैसे काउंसलिंग, सहायता समूह या भर्ती रहकर इलाज। आदतें, सोच और पुराना माहौल बदलने में महीने लगते हैं। इसीलिए लंबे और व्यवस्थित प्रोग्राम ज़्यादा काम आते हैं। ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट का प्रोग्राम 180 दिन का है और आठ चरणों में चलता है।
क्या परिवार मरीज़ से मिल सकता है और फोन पर बात कर सकता है?
अच्छे नशा मुक्ति केंद्र में मिलने और फोन पर बात करने का एक तय नियम होता है, जो वो आपको पहले ही बता देते हैं। कुछ सेंटर शुरुआती कुछ दिन मुलाकात नहीं कराते ताकि डिटॉक्स शांति से हो सके, पर ये बात पहले साफ होनी चाहिए। जो सेंटर कहे कि परिवार कभी मिल ही नहीं सकता और कभी फोन पर बात भी नहीं हो सकती, वो खतरे का संकेत है।
सेंटर देखने जाएं तो क्या क्या देखें?
कमरे, बिस्तर, शौचालय और रसोई खुद देखिए। हवा और रोशनी कैसी है, सफाई कैसी है, और योग या खेल के लिए खुली जगह है या नहीं, ये देखिए। स्टाफ से मिलिए और पूछिए कि रात को कौन रहता है। दीवारों पर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और शिकायत करने का तरीका लगा है या नहीं, ये भी देखिए। जो नशा मुक्ति केंद्र आपको अंदर देखने ही न दे, वहां भर्ती मत कराइए।
कौन से संकेत दिखें तो वहां भर्ती नहीं कराना चाहिए?
100 प्रतिशत इलाज या गारंटी का दावा, 15 दिन में नशा छुड़ाने का वादा, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दिखाने से इनकार, कोई डॉक्टर या मनोचिकित्सक न होना, उठाकर ले जाने वाली गाड़ी की सेवा, सिर्फ नकद में पैसे और कोई रसीद नहीं, परिवार को अंदर देखने या मिलने की इजाज़त न देना, और ज़ंजीर, ताले या मारपीट के कोई निशान। इनमें से कुछ भी दिखे तो वहां से लौट आइए।
कांगड़ा में सरकारी नशा मुक्ति केंद्र कहां हैं?
कांगड़ा ज़िला रेड क्रॉस सोसाइटी धर्मशाला के प्रयास भवन में ज़िला नशा मुक्ति केंद्र और नूरपुर में नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र चलाती है। राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की रजिस्टर्ड संस्थानों की सूची में इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी धर्मशाला और नूरपुर का आईआरसीए केंद्र, दोनों दर्ज हैं। डॉ राजेंद्र प्रसाद राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय टांडा में भी मानसिक स्वास्थ्य की सुविधा है। जाने से पहले फोन करके बिस्तर की उपलब्धता पूछ लीजिए।
सरकारी नशा मुक्ति केंद्र में खर्च कितना आता है?
ये एक नशा मुक्ति केंद्र से दूसरे में अलग होता है और हमें इसका कोई आधिकारिक रेट नहीं मिला, इसलिए हम कोई आंकड़ा नहीं बता रहे। सबसे सही तरीका है कि आप उसी केंद्र में फोन करके पूछ लें कि क्या खर्च लगेगा और उसमें क्या शामिल है। राष्ट्रीय हेल्पलाइन 14446 भी आपको आपके इलाके के सरकारी विकल्प बता सकती है।
महिलाओं के लिए हिमाचल में कौन सा सेंटर है?
हिमाचल सरकार ने शिमला के पास मशोबरा में नव जीवन महिला नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र शुरू किया है, जो राज्य का पहला सरकारी महिला केंद्र है। इसका उद्घाटन 9 जून 2026 को हुआ था। रेड क्रॉस सोसाइटी कुल्लू भी महिलाओं के लिए एक केंद्र चलाती है। ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट सिर्फ पुरुषों के लिए है, इसलिए महिलाओं के लिए आप टेली मानस 14416 पर भी मार्गदर्शन ले सकते हैं।
अगर मरीज़ पर एनडीपीएस का केस है तो क्या इलाज से कोई फायदा है?
एनडीपीएस अधिनियम की धारा 64A में एक राहत दी गई है। जो व्यक्ति नशे का आदी है और उस पर सेवन का या कम मात्रा से जुड़ा मामला है, वो अगर सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा चलाए या मान्यता प्राप्त अस्पताल या संस्थान से अपनी मर्ज़ी से नशा मुक्ति का इलाज कराता है और उसे पूरा करता है, तो उस पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। इलाज पूरा न करने पर ये छूट वापस भी ली जा सकती है। अपने केस के लिए वकील से सलाह ज़रूर लीजिए।
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती के समय कौन से कागज़ चाहिए?
हर सेंटर की ज़रूरत थोड़ी अलग होती है, इसलिए फोन पर पूरी सूची पहले मांग लीजिए। आम तौर पर मरीज़ का पहचान पत्र, परिवार के जिस सदस्य को ज़िम्मेदारी लेनी है उसका पहचान पत्र, पासपोर्ट साइज़ फोटो, और पहले हुए इलाज की पर्चियां या रिपोर्ट काम आती हैं। जो दवाइयां वो पहले से ले रहा है, वो डिब्बे सहित साथ ले जाइए, क्योंकि डॉक्टर को ये जानना ज़रूरी है।
नॉमिनेटेड रिप्रेजेंटेटिव कौन होता है?
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 में नॉमिनेटेड रिप्रेजेंटेटिव वो व्यक्ति होता है जो मरीज़ की तरफ से जानकारी पाता है और उसके हक का ध्यान रखता है। धारा 22 के तहत मरीज़ और उसके नॉमिनेटेड रिप्रेजेंटेटिव को ये बताया जाना चाहिए कि भर्ती किस कानूनी आधार पर हुई है, बोर्ड से समीक्षा कैसे मांगी जा सकती है, बीमारी क्या है, क्या इलाज होगा और उसके क्या असर हो सकते हैं। ये जानकारी ऐसी भाषा में मिलनी चाहिए जो समझ आ जाए।
शिकायत कहां करें अगर सेंटर में बदसलूकी हो रही है?
सबसे पहले हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण को लिखिए, क्योंकि रजिस्ट्रेशन वही देता है और वापस भी ले सकता है। ज़िले में निरीक्षण टीम मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अगुवाई में बनती है, जिसमें एसडीएम, डीएसपी और एक मनोचिकित्सक होते हैं, तो ज़िला प्रशासन को भी शिकायत दीजिए। मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड में भी जाया जा सकता है। अगर किसी को तुरंत खतरा है तो 112 पर कॉल कीजिए।
क्या हमारी और मरीज़ की जानकारी गुप्त रहेगी?
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 23 में मरीज़ को गोपनीयता का हक दिया गया है, और स्वास्थ्य पेशेवरों को इलाज से जुड़ी जानकारी गुप्त रखनी होती है। धारा 24 कहती है कि इलाज करा रहे व्यक्ति की फोटो या जानकारी उसकी सहमति के बिना मीडिया को नहीं दी जा सकती। भर्ती से पहले सेंटर से पूछ लीजिए कि वो गोपनीयता को लेकर क्या नियम मानते हैं।
ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट में फीस कितनी है?
शेयर्ड रेज़िडेंशियल केयर 12,500 रुपये प्रति माह, बी केयरिंग 25,000 रुपये प्रति माह और ए केयरिंग 40,000 रुपये प्रति माह है। डॉक्टर की निगरानी वाला डिटॉक्स 6,000 रुपये है, जो भर्ती के समय एक बार लगता है। इलाज तीनों प्लान में एक जैसा है, सिर्फ कमरा और खाना बदलता है।
ईशान चैरिटेबल ट्रस्ट किन नशों का इलाज करता है और किसे भर्ती करता है?
हम चिट्टा, हेरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर, शराब, चरस, गांजा, भांग, अफीम, डोडा, भुक्की, ट्रामाडोल, कोडीन सिरप, अल्प्राजोलम, कोकीन, एमडीएमए, इंजेक्शन से नशा और एक साथ कई नशों का इलाज करते हैं। हमारा केंद्र आवासीय है और सिर्फ 18 साल या उससे ऊपर के पुरुषों के लिए है, ऊपर की उम्र की कोई सीमा नहीं है।
क्या कोई नशा मुक्ति केंद्र 100 प्रतिशत इलाज की गारंटी दे सकता है?
नहीं। कोई भी ईमानदार नशा मुक्ति केंद्र न 100 प्रतिशत इलाज का दावा करेगा और न सफलता दर गिनाएगा। नशे की लत एक लंबी चलने वाली बीमारी की तरह है, और इसमें दोबारा फिसलना भी हो सकता है। जो नशा मुक्ति केंद्र गारंटी दे रहा है, वो आपको सच नहीं बता रहा।
डिटॉक्स के बाद ओवरडोज़ का खतरा क्यों बढ़ जाता है?
मेडलाइनप्लस के मुताबिक ओपिओइड से होने वाली ज़्यादातर ओवरडोज़ मौतें उन लोगों में होती हैं जिन्होंने अभी अभी डिटॉक्स पूरा किया हो। कुछ दिन नशा न लेने से शरीर की सहनशक्ति गिर जाती है, इसलिए जो खुराक पहले झेल लेता था, वही अब जानलेवा हो सकती है। इसीलिए डिटॉक्स के बाद का सहारा और फॉलोअप इतना ज़रूरी है।
परिवारों के लिए कौन से हेल्पलाइन नंबर हैं?
नशा मुक्ति के लिए राष्ट्रीय टोल फ्री हेल्पलाइन 14446 है, जो काउंसलिंग और रेफरल देती है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए टेली मानस 14416 पर मुफ्त मदद मिलती है। किसी भी आपात स्थिति के लिए 112 और एंबुलेंस के लिए 108 है। नशा बेचने की सूचना देने के लिए मानस हेल्पलाइन 1933 या ड्रग फ्री हिमाचल ऐप का इस्तेमाल कीजिए।
आखिरी बात, उस परिवार के लिए जो अभी फैसला ले रहा है
अगर आप यहां तक पढ़ आए हैं, तो जिस इंसान की आपको चिंता है वो खुशनसीब है। नशा ताकतवर है, पर एक ऐसा परिवार जो शांत रहकर सही मदद ढूंढता है, उससे कम ताकतवर नहीं।
आज एक छोटा कदम उठाइए। हेल्पलाइन नंबर फोन में सेव कीजिए। ऊपर दिए 14 सवालों की सूची कागज़ पर उतार लीजिए। और जिस भी नशा मुक्ति केंद्र पर विचार कर रहे हैं, उसे फोन करके पहले सवाल पूछ लीजिए। सब कुछ तय करके ही शुरू करना ज़रूरी नहीं है, और ये सब आपको अकेले नहीं करना है।
स्रोत और संदर्भ
इस गाइड का हर आंकड़ा, तारीख और कानूनी बात नीचे दिए स्रोतों से ली गई है। हमने किसी गिरफ्तार व्यक्ति, पीड़ित या परिवार का नाम नहीं लिखा है।
- भारत सरकार। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017, इंडिया कोड पर।
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 का पूरा पाठ, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र की वेबसाइट पर पीडीएफ।
- हिमाचल प्रदेश राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट।
- नशा उपचार और पुनर्वास केंद्रों के लिए न्यूनतम मानक, एचपीएसएमएचए।
- एचपीएसएमएचए। रजिस्टर्ड निजी मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की सूची।
- मेडलाइनप्लस, अमेरिकी राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय। ओपिएट और ओपिओइड विदड्रॉल।
- मेडलाइनप्लस, अमेरिकी राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय। डेलीरियम ट्रेमेंस।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन। ओपिओइड ओवरडोज़, फैक्ट शीट, 29 अगस्त 2025।
- एनडीडीटीसी, एम्स नई दिल्ली, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के लिए। मैग्नीट्यूड ऑफ सब्सटेंस यूज़ इन इंडिया, 2019।
- राजस्व विभाग, भारत सरकार। एनडीपीएस अधिनियम की धारा 64A, नशे के आदी व्यक्तियों के लिए विशेष प्रावधान।
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय। टेली मानस, राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम।
- सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय। नशा मुक्त भारत अभियान।
- पत्र सूचना कार्यालय। नशा मुक्ति के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना और हेल्पलाइन 14446, 6 मई 2025।
- राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र। ड्रग फ्री हिमाचल मोबाइल ऐप।
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- यूएनआई। लुधियाना के पास गैरकानूनी नशा मुक्ति केंद्र पकड़ा गया, 133 लोग छुड़ाए गए, 29 सितंबर 2026।